भोर
भोर
मैं दिशाहीन-सा चला जा रहा था जैसे कुछ दिख ही न रहा हो। तभी मेरे हाथ किसी पत्थर से टकराये। मैं उसे पकड़ते हुए आगे बढ़ने लगा। वह कोई सुरंग थी शायद! अंदर थोड़ा धुआँ-सा था। जैसे वहाँ लकड़ियाँ जलाई गई हों।
मैं आगे बढ़ ही रहा था कि तभी उस धुएँ में से एक 'आकृति' उभरी। उसके चेहरे पर नकाब था और दोनों हाथों में हथियार। वह मेरी ओर बढ़ी तो मैं पीछे हटने लगा। यकायक मेरी पीठ किसी सख्त चीज से टकराई। मेरे लिए अब और पीछे हटना नामुमकिन था।
वह आकृति ठहाका मारकर हँस पड़ी। हथियार मेरे हाथ में थमाते हुए बोली, "ये पकड़। और हाँ.... पैसा तेरे खाते में जमा हो जाएगा।"
"ल..लेकिन तुमने तो कहा था कि म..मुझे सरहद पार जाकर सिर्फ अफवाहें...फिर ये हथियार किस...लिए?"
"हा हा हा" उसका ठहाका फिर गूँज उठा, "भूल गया! तेरा ईमान अब मेरे कब्ज़े में है। जैसा मैं कहूँ तुझे वैसा ही करना होगा।"
मुझे लगा जैसे पीछे की सख्त दीवार पर हजारों कीलें उग आईं हों। मेरी पीठ छलनी होने लगी। उससे बहता गर्म लहू अन्य जगहों से आते खून में मिलने लगा।
तभी बहुत करीब से किसी के रोने की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा तो मेरा बेटा मेरी ही रक्त सनी लाश पर सर पटक कर रो रहा था।
"अरे! यह तो...!" मैं हैरान रह गया। घबराहट में वहाँ से भागने की कोशिश में मैं नीचे पड़े खून में फिसल कर गिर पड़ा। मुझे 'गिरा हुआ' देखकर मेरा बेटा मुझसे ही सहम कर उठ खड़ा हुआ। अचानक उसकी आँखें और आवाज़ मुझे अम्मी-सी लगने लगीं जैसे कह रही हों, " बेटा, अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। लौट आ।"
मैं नींद से हड़बड़ा कर उठ बैठा। पसीने से तरबतर हो इधर-उधर देखा। बेटा पलंग पर आराम से सो रहा था। गुसलखाने से अम्मी की आवाज़ और कहीं दूर से 'अज़ान' की आवाज़ आ रही थी।
अचानक मेरी नज़र कैलेंडर पर पड़ी। आज का दिन ही तो मुकर्रर हुआ था 'उस ओर' जाने के लिए।
"इतनी देर हो गई! किसी ने मुझे जगाया क्यों नहीं?" मैंने चीखते हुए पूछा।
"नही बेटा, अभी ज्यादा देर नही हुई है।" गुसलखाने से आती अम्मी की आवाज़ अज़ान की आवाज़ में घुल गई। मैं चौंक पड़ा।
"ओह! उस ख़्वाब में भी तो अम्मी ने यही कहा था! तो इसका मतलब वह लाश!...वह 'सब' भी सच हो सकता है!!"
अब डर मेरी नस-नस में समा चुका था। ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। मैं बस इतना ही कह पाया, "अ..अ..अम्मी...आज हो सके तो...तो बैंक में मैनेजर साहब से मिलकर म...मेरा खाता कुछ दिनों के लिए ब...बन्द करवा देना।"
अब चौंकने की बारी अम्मी की थी, "अरे! लेकिन क्यों? और ये तू हकला क्यों रहा है?" अम्मी अपनी कुर्ती से हाथ पोंछती हुई बाहर आई। मुझे चप्पल पहनते देख बोली, "अरे सुन! रुक तो। यूँ उठते ही...?"
अम्मी कुछ और पूछती उसके पहले ही मेरे पैर पुलिस थाने की ओर मुड़ चुके थे।
