Anu Singh

Drama Inspirational


1.3  

Anu Singh

Drama Inspirational


झूठ के बंधन

झूठ के बंधन

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आरोही को देखने के लिए आज लड़के वाले आ रहे थे।घर-परिवार बहुत संपन्न था।लड़का भी अच्छी नौकरी में था।आरोही की माँ कल्पना जी और बहन गीता उसे तैयार करने में लगी थी। गीता ने कहा " देखना आरोही! अगर सब कुछ ठीक रहा तो आज ही सगाई पक्की हो जायेगी." कल्पना जी भी ख़ुशी से बोली "अगर बात पक्की हो गयी तो मैं आज ही लड़के को अंगूठी पहना कर शगुन कर दूँगी।" आरोही भी भविष्य के सपने सजाए मुस्कुरा रही थी।


थोड़ी ही देर में लड़के वाले आ गए। सभी को आरोही बहुत पसंद भी आई। लड़के का नाम अरुण था। अरुण की माँ शोभा जी तो आरोही से ही बातें करने मे लगी थी। थोड़ी देर में ही सगाई की बातें भी शुरू हो गयी। आरोही का पूरा परिवार बहुत खुश था। कल्पना जी ने आवाज़ दी "अरे गीता बिटिया! मिठाई ले आओ बात पक्की हो गयी है।सबका मुँह मीठा करवाओ।" गीता मिठाई लेकर आ गयी।तभी शोभा जी ने चश्मा नीचा कर गीता को देखा और पूछा "ये कौन है बहन जी?"


कल्पना जी ने ख़ुशी से बताया "ये मेरी बड़ी बेटी है..कॉलेज में लेक्चरार है।" शोभा जी ने जायज़ा लेते हुए पूँछा "तो फिर आप लोगों ने बड़ी बेटी की शादी पहले क्यों नही की?"

कल्पना जी ने थोड़ा संकोच से कहा "वो गीता की शादी तो हुई थी लेकिन तलाक हो गया 2 साल पहले.।"


शोभा जी बड़े ऊँचे स्वर में बोली "तलाक! ये भी होता है आपके घर में।" उन्होंने अपना लहजा बदलते हुए अपने बेटे से कहा "अरुण बेटा देख पापा और अंकल गार्डन में होंगे।कह दे बहुत देर हो गयी अब चलते हैं। मिलना-मिलाना तो चलता ही रहेगा।"


कल्पना जी ने उन्हें बहुत रोकने का प्रयास किया और तोहफे भी देने चाहे लेकिन वो रुके नही, न ही तोहफे लिए।शोभा जी ने ये कहा कि हम एक दो दिन में बता देंगे कि हमारे क्या विचार है आप चिंता न करिये। घर आने पर जब अरुण के पिता जी ने यूँ अचानक चले आने की वजह पूछी तो शोभा जी बिफ़र पड़ी "अरे हमारा इकलौता बेटा है उसके लिए ऐसी लड़की.. ऐसा परिवार! न बाबा न।मैं नही करुँगी ऐसे परिवार में अपने बेटे की शादी जहाँ पहले ही एक बेटी तलाक लिए बैठी है। आज एक ने लिया है कल दूसरी भी वैसी ही निकली तो हम क्या करेंगे। समाज थूकेगा हम पर।पता नही क्या संस्कार दिए होंगे लड़की को..मेरी तरफ से तो न है।" सभी खामोश रहे कुछ देर फिर अरुण चुप-चाप कमरे में चला गया। 


करीब एक सप्ताह के बाद रविवार का दिन था।शोभा जी और अरुण के पापा सोफे पे बैठे चाय पी रहे थे।अरुण भी अपने किसी काम में लैपटॉप पर व्यस्त था। तभी शोभा जी के फ़ोन की घंटी बजी। "अरे ये कल्पना जी का फ़ोन है।अब हम नही जवाब दे रहें है तो समझ ही जाना चाहिए उनको कि हमे रिश्ता नही पसंद ये रोज-रोज फ़ोन करने की क्या जरूरत है.?" अरुण के पिताजी बोले "अरे ऐसे कैसे समझ जाएंगे कुछ तो बताना पड़ेगा उनको।बेटी का मामला है कुछ तो सोचो शोभा।"


तभी बाहर एक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आयी। सभी बाहर जाते उससे पहले ही अरुण की बेहन कोमल भागती हुई आयी और माँ के गले से लिपट गयी। वो रोये जा रही थी।अरुण भी जल्दी से उठ कर आया देखा तो कोमल के शरीर पर नीले चोट के निशान थे।आंख भी सूजी हुई और काली पड़ चुकी थी। कोमल बस एक ही रट लगाये थी "मुझे उस हैवान के पास नही जाना।वो लोग मुझे मार डालेंगे। मम्मी-पापा मुझे बचा लो।"


अरुण ने डॉक्टर को बुलाया और कोमल को दवा दिलवाई। इतने में कल्पना जी, आरोही के पापा और गीता शोभा जी के घर की देहरी पर खड़े दिखे।शोभा जी ने जल्दी से अपने आंसू पोछे और कोमल को कमरे में ले गयी। अरुण ने उन्हें अंदर बुलाया। कोई कुछ कहता उससे पहले ही गीता ने सबसे कहा "अगर मेरी वजह से मेरी बहन के रिश्ता तोड़ रहे है तो ऐसा मत कीजिये।ही मेरी बहन में कोई कमी नही है..आप सब मेरी बहन को स्वीकार कर लीजिए।"


शोभा जी से कल्पना जी ने कहा "बहन जी!आपकी बेटी तो फिर भी सही सलामत है।जब हमारे पास गीता ने ससुराल से फोन किया था और हम जब उसके पास पहुंचे तो वो हमें फांसी पर झूलती मिली थी।अगर हमें एक मिनट भी देर हो जाती तो हम इसे खो देते। हमेशा लड़की या उसके संस्कारों की गलती नही होती।ये समाज ऐसे लोगों से भरा है जिन्हें किसी दूसरे की औलाद के दुःख की परवाह नही होती।जब अपनी संतान छोटी होती है और जरा सी ठोकर भी लग जाय तो माँ-बाप का कलेजा मुंह को आ जाता है। फिर ये दरिंदे इतना मारते है,कई बार मार भी डालते है तो इनकी परवरिश नही.. बल्कि बेटी की परवरिश में खोट कैसे हो गयी?मैंने मेरी बेटी को झूठे बंधनों से आजाद किया अब आप उसे पछतावे का दंड मत दीजिये।बाकी आपको जैसा ठीक लगे।"


अरुण बोल पड़ा "अपनी बहन को ऐसी हालत में देख कर मुझे तो इतना गुस्सा आ रहा है कि मन करता है उस पूरे परिवार को हवालात पहुँचा दूं। आपने बहुत सहन किया है गीता जी। आरोही के साथ कुछ गलत नही होगा ये वादा है।"


शोभा भी किनारे बैठी आँसू बहा रही थी उठ कर धीमे क़दमों से आयी और गीता के सर पर प्यार से हाथ फेर दिया। "मुझे माफ़ कर दे बच्ची..।" फिर कल्पना जी से कहा "आपको जो भी तारीख सही लगे आप सगाई निश्चित कर लो।हम ख़ुशी ख़ुशी आरोही को घर की बहू बना कर लाएंगे।"


कोमल भी बाहर आ गई।शोभा जी ने उसे जाकर पकड़ा "अरे तू क्यों आ गई ।डॉक्टर ने आराम करने को बोला है तुझे" कोमल ने कहा "माँ इतने समय से अपना दुख सबसे छिपा कर रखा था तो इतना झेला, आज इतनी बड़ी खुशी मिली है तो पूरी दुनिया को दिखाना है मुझे कि मैं कितनी खुश हूँ.. मेरे भाई की शादी है।"


सभी के चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता के भाव थे।




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