बचपन
बचपन
(सत्य घटना पर आधारित)
आज बैठे-बैठे यूं हीं बचपन की कुछ बातें अनायास हीं याद आ गई और एक हल्की सी मुस्कान अधरों पर छा गई। सोचता हूं, ये बचपन भी कितना निश्छल होता है? जो मन में आया कर दिया और बोल दिया। है न, कितना प्यारा बचपन!
बात उन दिनों की है जब मैं यही कोई 4-5 वर्ष का रहा होऊंगा। उस समय हमारा परिवार गांव में रहा करता था। कितना अपनापन और मेल-जोल हुआ करता था उस समय! सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े हुआ करते थे। पर जब आज से उसकी तुलना करते हैं तो कितना अकेलापन महसूस करते हैं।
हां तो, हम थे अपने बचपन की यादें में, जहां हम 4-5 मित्र होते थे- सभी एक से बढ़कर एक। जितनी उम्र थी, उतनी हीं बड़ी बुद्धि। एक दिन हमारा एक मित्र पेड़ पर चढ़कर खेलने लगा। बाकी सभी मित्र भी देखा-देखी पेड़ पर चढ़ गए और खेलने लगे। तभी उनमें से एक ने कहा-"देखो, चिड़िया कैसे उड़ती है?" इस पर सबने पूछा कि बताओ कैसे उड़ती है। तब पहले मित्र ने कहा कि अगर तुम्हारे हाथ-पैर बांधकर नीचे फेंक दिया जाए तो तुमसब भी उड़ने लगोगे। बस, क्या था? यह सुनकर सब बहुत खुश हुए कि अब हम सब भी उड़ सकते हैं। अब यह निश्चित करना था कि पहले कौन पहले उड़ेगा? तभी उनमें से एक मित्र का एक रिश्तेदार जो वहां घूमने के लिए गांव आए थे, उन्हीं के लड़के को पहले उड़ाने की योजना बनाई गई। निश्चित समय पर उसको पेड़ पर चढ़ाकर हाथ-पैर बांधकर पेड़ से नीचे फेंक दिया गया। पर, ये क्या? वह नीचे गिरकर जोर-जोर से रोने और चिल्लाने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर आस-पास के लोग इकट्ठे हो गए। पूछने पर जब पूरी कहानी का पता चला, तब हम सब की खोज शुरू हुई कि किसने यह बुद्धि लगाई थी। हम सब भी भागकर गांव के आखिर में बने मंदिर के पीछे छुप गए और रात होने तक घर नहीं लौटे। इधर गिरने से उसके पैर टूट गए थे। अब उड़ना तो दूर, चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया था।
ऐसा था हमारा बचपन और ऐसी हीं बहुत सारी खट्टी-मीठी यादें, जो वक़्त-बेवक़्त आकर हंसा जाती थी।
