अम्मा
अम्मा
बारिश रूकने का नाम ले रही थी, हम पहाड़ के खुशनुमा मौसम की तलाश में रानीखेत निकल पड़े।
आसमान में हर तरफ धुंध का माहौल था, यकायक बारिश रूकी, कुछ राहत सी मिली, पर कुछ देर के बाद बारीश फिर शुरू हो गयी, ऐसा लग रहा था मानो शिवजी की जटा से जैसे माँ गंगा बार बार धरती को अपने अमृत कैशो से अमृत हाला पिला रही हो, क्योंकि इस धरती में रहने वाला मानव अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दानव बन गया है , क्योंकि अपने सुख के लिए वो किसी को इस्तेमाल कर सकता है। यह है इस कलयुग में मानव की असली परिभाषा,
तभी गाड़ी एक खूबसूरत स्टाँप पर रूकी और मैं जल्दी से गाड़ी से उतरी, तो देखा पहाड़ और बादल आपस में जैसे बातें कर रहे हो। मानव मानव से घृणा करता है तब मन में विचार आया मनुष्य को इस प्रकृति से सीख ना चाहिये कि रिश्ते कितने जरूरी होते है और निभाने भी।
रिश्ते जोड़कर चलते हैं ना कि तोड़कर। हमसे तो प्रकृति के रिश्ते बेहतर होते हैं तो निभाने की परिभाषा को समझते हैं हम आधुनिक युग की दौड़ में रिश्ते तोड़कर जिंदगी को जी रहे हैं। जो अंत तक मनुष्य की मनुष्यता भुला देती हैं और अवशेष भी नहीं बचते पहले की तरह स्वर्णिम यादों के।
तभी मैंने देखा सामने एक झोपड़ी नुमा घर है वहाँ दीवार पर लिखा था अम्मा टी स्टाल। मैं दौड़ कर ठंड से बचने और चाय की तलब लेकर अंदर चली गयी वहाँ जाकर देखा कि मिट्टी के चूल्हे के आग धघक रही थी,और चूल्हे में बहुत बड़ी एक केतली में शायद चाय चढ़ी हुई थी, और बगल के चूल्हे में एक बड़ी कढ़ाही चढ़ी थी, जिसमे तेल गरम था और पकौडियां तल के बाहर आ रही थी मैने, देखा एक एक अम्मा जिसके चेहरा दमकता हुआ और आँखों मे चमक लिये फटाफट पत्तल की प्लेटों मे पकौड़ी और मिट्टी के कुल्लड़ मे चाय बाँट रही थी।
इतनी ऊर्जा इस उम्र में, मैं खो सी गई और तभी मेरे हाथ में स्पर्श हुआ, तभी मैं सोच से बाहर आयी, बोली बेटा चाय पीनी है मैने भी बिना सोचे हाँ कहा और पकौड़ी भी, बस कुछ मिनट में मेरे हाथ में चाय का गिलास और गरम गरम पकौड़ी थी। अम्मा बोली ठंड लग रही है तो तुम कुर्सी लगाकर यही आग सेकते हुए चाय पकौड़ी का आनंद लो। मैं भी कुर्सी लगाकर आग सेकते हुए, चाय की चुस्की के साथ पकौड़ी का स्वाद ले रही थी।
मैने पूछा अम्मा इस उम्र में इतनी ऊर्जा, बोली बेटा वक्त सब करवा देता है, और बोली बेटा पहाड़ में अब कुछ रहा, जब से पलायन हुआ कम उम्र मे विधवा हो गयी तो जिम्मेदारी सर पर आ गयी, कुछ समय बाहर काम किया फिर अपने ही मिट्टी में ललक खींच लाई, और यहाँ आकर छोटा सा टी स्टाल खोला, अब बच्चे बड़े हो शहर बस गये है सब की शादी हो गयी है। वो वहाँ खुश मैं यहाँ खुश, बच्चे बुलाते है पर क्या करूँ अपनी माटी नहीं छोड़ी जाती।
मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था,जो मैं अम्मा की काम करने ऊर्जा मैं ढूंढ रही थी, तभी मेरी गाड़ी का हार्न बजा, और मैं जल्दी से अम्मा से विदा लेकर चली गयी और अपनी सीट वाली खिड़की से नज़र गयी फिर उस उर्जा युक्त शरीर पर, जिसने कभी हारना नही सीखा, तभी मेरी गाड़ी चल पड़ी,अपनी खुशनुमा यात्रा की।
