अहंकार
अहंकार
शहर में एक मंदिर था। वहां रोज शाम को भजन कीर्तन हुआ करता था। सभी आसपास की महिलाएं जमा होती थी और मंदिर में भजन-कीर्तन किया करती थी। उसी मंदिर में एक गरीब पुजारिन रहती थी, पूजा पाठ किया करती थी मंदिर के भरोसे ही उसका गुजारा चल रहा था। दिन-रात मंदिर में ही सेवा करती थी। जब भजन कीर्तन होता तो वो भी वहां बैठकर सुनती थी। एक दिन शाम को सभी महिलाएं इकट्ठा हुईं, भजन कीर्तन शुरू हुआ, वो बूढ़ी
पुजारिन भी वहां बैठी थी और भजन सुन रही थी, आनंद ले रही थी। दो महिलाएं आपस में वहीं बैठ कर बातें कर रही थी, सभी मस्ती में थे। पर उस पुजारिन ने दोनों की बातें सुनी और जाकर धीरे से कहा, "बिटिया भजन में शामिल हो भगवान का नाम लो, किसी और का मजाक मत उड़ाओ, यह समय व्यर्थ मत गंवाओ!"
इतने में उनमें से एक ने कहा, "तुम हमें क्या समझा रही हो, इतने दिनों से तो भक्ति कर रही हो, लेकिन अपने गुण देख, यहीं भटक रही हो और छुप कर चोरी चोरी सबकी बातें भी सुनती हो, हमारी बातें सुन रही थी, ये नहीं जानती छुप कर बातें सुनना पाप है, हमें मत सिखाओ, मैं तो अगले सप्ताह हरिद्वार जा रही हूं, ईश्वर की इतनी कृपा है, तब तो मुझे हरिद्वार बुला रहे हैं, तू तो यहीं इसी मंदिर में रहती है, अगर भगवान की इतनी सच्ची भक्ति है, पुण्य आत्मा है...तो कोई तीरथ क्यों ना जा पाई, भगवान जी ने तुम्हें बुलाया ही नहीं, तुम्हारे मन में तो खोट है....इसीलिए सब की बातें सुना करती हो, चली आई सलाह देने के लिए, हुंहऽऽ!"
तीन-चार दिन बाद इसी तरह सभी महिलाएं इकट्ठा हुईं।
पुजारिन ने देखा, वही जिसने उसे इतनी बातें सुनाई थी, वो चुपचाप उदास हो एक कोने में बैठी भजन सुन रही थी।
तो उसने जाकर पूछा, "अरे बिटिया, तू तो हरिद्वार जा रही थी....क्या हुआ? तू उदास लग रही है!"
तो उसके साथ दूसरी महिला थी, उसने कहा, "इसके हरिद्वार का प्रोग्राम कैंसिल हो गया है, अचानक इसके ससुर जी की तबीयत खराब हो गई, है इसलिए नहीं जा पाएगी हरिद्वार!" उस पुजारिन ने कहा, "कोई बात नहीं, जब ईश्वर की इच्छा होगी, तो जरूर बुलाएंगे! "
तभी एक मंदिर के पुजारी ने आकर बूढ़ी पुजारिन से कहा, मां जी रात को बस यहीं लगी रहेगी, मंदिर के सामने, द्वारिकाधीश जाने वाली बस का नंबर 3 है, आप उसी बस में बैठ जाइएगा, सारी तैयारी कर लीजिए, याद रखियो!"
वो दोनों महिलाएं एक-दूसरे का मुंह देखने लगी।
जो हरिद्वार नहीं जा सकी, वो मन मन में पश्चाताप करने लगी, ये मेरे अहंकार की वजह से हुआ है...सच में ईश्वर है, इस संसार में, जो हमें अपनी भूल का अहसास करवाते हैं!" उसने तुरंत उस पुजारिन को कुछ पैसे निकाल कर दिए और कहने लगी, "माँ जी, उस दिन मैंने आपसे जो कहा, उसके लिए माफी चाहती हूं, मुझे माफ कर दीजिए... ये पैसे रखें, आपके काम आएंगे, पुजारिन ने उसके सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद दिया और भजन में खो गई।
