ये मेरे रूबरू कौन है
ये मेरे रूबरू कौन है
ये मेरे रूबरू कौन है
है अदृश्य भी ,
साक्षात भी !
रहता है मौन भी ,
करता है बात भी !
सुन लेता खामोशियां ,
पढ़ लेता जज़्बात भी !
कभी कभी अपनी
उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों का ही ,
वो करा देता है आभास भी !
वो धरा भी है ,
आकाश भी !
वही मेरी श्रद्धा है ,
वही मेरा विश्वास भी !
