STORYMIRROR

rajesh asutkar

Abstract

4  

rajesh asutkar

Abstract

यादों का बादल

यादों का बादल

1 min
437

शाम के रूठे हुए आसमाने पूछा

क्यों बैठे हो ऐसे मुंह फुलाकर

किसीकी यादों में खोए हो

या गिन रहे हो तारे किसी के इंतजार में


इंतजार तो में भी करता हूं

उस सुबह का

जिस दिन वो मुझे मिले

और अपनी कांति से 


मेरे भीतर के अंधकार को मिटा दे

पर कमबख्त ये रात अजीब सी है

उसके ना होने को भुला देती है

और अपने एहसास को जगा देती है

 

हमने शामसे कहा हम तो

उसकी यादों के बादल में 

सवार होकर निकलते है उस सफर में

जिसपे बस हम है और उसकी यादें

कुछ कोरे पन्ने और वही नीली स्याही


ये सफर चलता रहता है

जबतक बारिश ना हो जाए

जब बारिश हो जाती है


मिट जाती है वो नीली स्याही

जो हमने कोरे कागजों पर उतारी थी

और रह जाता है बस

वो काला बादल 

गरजता हुआ।


రచనకు రేటింగ్ ఇవ్వండి
లాగిన్

Similar hindi poem from Abstract