व्याकुल मन
व्याकुल मन
नन्हे से पेरो में जान कहां थी थोड़ा सा कदम तुमने बढ़ाया थोड़ा हमको सिखाया
फिर हमें समझ में आया चलना क्या होता है फिर हमने कदम बढ़ाया
थोड़ा कदम बढ़ाया की, पर रुका कहां है ये तो बस दौड़ ना चाहा,
जब मैं दौड़ा, बांध सखा ना कोई तो ये समझ में आया,
दौड़ा मेरा शरीर नहीं मेरा मन है इसके अंदर कई प्रश्न हैं,
इस मन को जानने के लिए फिर छात्र जीवन में प्रवेश का आरंभ हुआ।
ज्ञान पाने के लिए मन में लालसा बड़ी, मन व्याकुल हुआ,
नए प्रश्न का आगमन हुआ प्रश्न के उत्तर की तृष्णा बढ़ी
ज्ञान के भंडार का मस्तिष्क ने स्वागत किया एवं स्वयं को जानने का आभास हुआ।
