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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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वैवाहिक बंधन के पच्चीस वर्ष

वैवाहिक बंधन के पच्चीस वर्ष

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दोहे- वैवाहिक बंधन के पच्चीस वर्ष  ********** पावन परिणय को  हुए,   पूर्ण वर्ष पच्चीस।  हम  दोनों  के  मध्य  है, तालमेल  छत्तीस।।                                कटे  वर्ष  पच्चीस  हैं, पति  उपाधि  से  आज।  चाह रहे क्या खोल दूँ, सुख-दुख के सब राज।। बंधन   फेरे   सात   के,     हुए  ‌ वर्ष  ‌ पच्चीस। जीवन के इस समर में, निकली अपनी खीस।। पत्नी  जी  के  राज  का,     आया  नया  पड़ाव। निज शासन की क्या कहें, नहीं रहा कुछ भाव।। अंजू जी की चल रही, बहुमत की सरकार। गठबंधन की अब नहीं, है उनको दरकार।। बहुत कठिन संयोग  है, चले जिंदगी पाथ।। जीवन पथ हम बढ़ रहे, दया दृष्टि के साथ। जीवन बगिया में खिले, रंग बिरंगे फूल। धूल धूसरित हो रहे, सपने चुभते शूल।। इक पड़ाव पर आ गए, नहीं और की चाह। बाकी  मर्जी  ईश  की, वही  दिखाएँ  राह।। सुख दुख के इस दौर का, कैसे करुँ बखान। अज्ञानी  मैं  ले  रहा,    अंजू  जी  से  ज्ञान।। पुरखे भी यमलोक से, भेज  रहे  उपहार। बौछारें आशीष की, अनुपम प्यार दुलार।। आप  सभी  से  चाहिए, बस  इतनी  सौगात। सुखदा द्वय जीवन रहे, शीत उष्ण बरसात।। जन्म दिवस अब हो गया, बीते दिन की बात। स्मृतियाँ  संचित  रहें,   सुखद  ईश  सौगात।। रहे कृपा भगवान की, शेष  सुखद  हों  वर्ष। जैसे हैअब तक कटे,  शेष सुखद सह हर्ष।। सुधीर श्रीवास्तव  


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