स्त्री
स्त्री
हाँ मैं स्त्री हूँ
हाँ मैं स्त्री हूँ
चार वेदो से भी पूज्य
मैं ही वेदांगी हूँ
मुझमे ही समाहित
शुभ और लाभ है
क्योंकि मैं ही तो वामांगी हूँ
मैं तृष्णा ,मै वासना
पर मैं हीं तो गंगा पापहारनी हूँ
मैं तुलसी,मै लक्ष्मी
पर मैं हीं तो धैर्य रति हूँ
सुख में संगी दुख की साथी
मैं ही जीवन दायिनी हूँ
ओस सा गिरती सीप की मोती
ओझल होती जैसे चाँदनी
सूरज के दर्प से चमत्कृत
मैं ही तो हर रौशनी हूँ
मैं सुबह और शाम में समाहित
चारों ऋतुओं की उद्गीनता हूँ
पर मैं ही तो पुरुषत्व में समाहित
स्त्रीत्व की मर्यादा हूँ
क्योंकि मै ही भोग्या मैं हीं भोग्य
और मैं ही तो संपूर्ण सृष्टि हूँ
इसलिए तो मैं स्त्री हूँ।
