सोच समझकर शब्द बोलिए
सोच समझकर शब्द बोलिए
सोच समझकर शब्द बोलिए आज सुबह-सुबह फोन कर मित्र यमराज ने कहा प्रभु! सोच समझ कर शब्द बोलिए मैंने कहा क्या हो गया यार? भला तू ऐसा क्यों कह रहा है? अभी तो मैंने कुछ बोला ही नहीं, फिर सोचने समझने की बात कहाँ से आ गई? यमराज ने कहा - नहीं प्रभु! सोच समझ कर शब्द बोलिए मैंने भी दोहरा दिया -सोच समझकर शब्द बोलिए मेरी बात सुन वो झल्लाकर बोला- सोच समझ कर शब्द बोलिए । तो मुझे भी गुस्सा आ गया बिल्कुल नहीं बोलूँगा, जो करना है, कर ले। जब उसे लगा कि मुझे गुस्सा आ रहा है तब वह बड़े प्रेम से बोला- बस प्रभु! यही तो मैं कहना चाहता हूँ जो भी बोलिए, प्रेम से बोलिए या फिर न ही बोलिए और बोलिए भी तो सोच समझ कर ही शब्द बोलिए अपने हिसाब से बोलिए, अपने हित के लिए बोलिए दुनिया जाए भाड़ में, शब्दों से खुलकर खेलिए। मैंने गहरी साँस ली और कहा - तो तैयार हो जा अब मैं सोच समझकर बोलने जो रहा हूँ तुझसे अभी के अभी यारी तोड़ रहा हूँ। इतना कहकर मैंने फोन काट दिया अगले ही पल यमराज सामने आकर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर कहने लगे - प्रभु! आप ऐसा कैसे कर सकते हो? सोचने समझने की आड़ में मेरे साथ मुझसे यारी कैसे तोड़ सकते हो? मैं तो मजाक कर रहा था- फोन किसी और को लगा रहा था, जब आपको लग गया तो आनंद लेने लग गया था क्योंकि आपके सिवा मेरा और कौन है सगा? यारी रखो या तोड़ दो, फिलहाल मुझे भोजन तो करा दो बहुत भूख लगी है, काम का दबाव और समय का अभाव भी बहुत है फिर दुनिया भी तो चीख-चीख कर रही कह रही है कि इस धरती लोक पर सिर्फ और सिर्फ एक तू ही तो मेरा खैरख्वाह और बगलगीर है, मैंने अपना सिर पीट लिया और उसे खिला-पिलाकर विदा किया, मगर यह सब खुशी से नहीं मजबूरी में किया, यार कि फिर से अपना लिया। सुधीर श्रीवास्तव
