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sachin goel

Abstract

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sachin goel

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समझ नहीं आता

समझ नहीं आता

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झूठ कहूँ या, सच कह दूँ मैं

समझ नहीं आता, है कुछ भी

बिखरे हुए हैं, फ़िजा में जलवे

मुझको नहीं भाता, है कुछ भी

छोड़ो चलो, अब, बस करते हैं

बाकी बातें, कल करते हैं


कहने को तुम साथ हो मेरे-2

लेकिन कोई साथ नहीं है

मुझको अकेला छोड़ो यारों

ठीक मेरे, हालात नहीं है

झूठ कहूँ या, सच कह दूँ मैं

समझ नहीं आता, है कुछ भी।


बन्धन सारे टूट रहे हैं

हाथ सभी के छूट रहे हैं

किसको अपना समझूँ यारों

अपने मुझको लूट रहे हैं

उजला दिन मुझे खाने लगा है

चाँद भी आंखें दिखाने लगा है


पहले जलाता था बस सूरज

चाँद भी अब तो जलाने लगा है

वैसे तो सब ठीक है सब कुछ

चिंता की कोई,बात नहीं है

झूठ कहूँ या,सच कह दूँ मैं

समझ नहीं आता, है कुछ भी।


मिलती हैं थोड़ी, खुशियाँ मुझको

थोड़ा मैं भी, ख़ुश होता हूँ

अगले ही पल में, बस तन्हाई

बैठ के तन्हा, तन्हा रोता हूँ

मुझको पता हो, तो बात बताऊँ

ख़ुद रूठूँ या, सबको मनाऊँ।


टूट चुका हूँ, कुछ महीनों में

जी करता है, अब सो जाऊँ

जैसी पहले थी जीवन में

वैसी "सचिन" रात नहीं है

झूठ कहूँ या सच कह दूँ मैं

समझ नहीं आता है कुछ भी।


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