रिश्ते
रिश्ते
रिश्ते नाते हो रहे, लाभ हानि की चीज।
जिसका जिससे फायदा, उसका वही अजीज।।
स्वार्थयुक्त रिश्ते हुए, सबसे अपनी बात।
करता रहता है मनुज, जीवनभर दिन रात।।
धन दौलत ही मूल है, शाखा रिश्तेदार।
रिश्ता रखने के लिए, पैसा ही आधार।।
उसका होता मान है, जो हो धनी अकूत।
अर्थहीन रिश्ते वही, जो धनहीन कपूत।।
भौतिकता है अति प्रबल, प्रतियोगी है चाह।
उपयोगी रिश्ते वहीं, अर्थिक जहां प्रवाह।।
ठूंठ पेड़ की तरह है, सूखा रिश्तेदार।
जिसका घर है झोपड़ी, भोजन की भी मार।।
कलियुग आया देख कर, टूटे रिश्ते आज।
तितर वितर सब हो गया, प्रिय रिश्तों का ताज।।
खाने के लाले जहां, उसको पूछे कौन ?
दशाहीन जीजा हुआ, ससुरालय में मौन।।
रिश्ता उससे सब करें, जो मोटा इंसान।
ठठरी का करता नहीं, कोई भी यशगान।।
उत्तम रिश्ता है वही, जो करता सहयोग।
वह रिश्ता है ताक पर, जिसका नहिं उपयोग।।
