STORYMIRROR

Mahavir Uttranchali

Abstract

4  

Mahavir Uttranchali

Abstract

प्यार का दफ़्तर खुला

प्यार का दफ़्तर खुला

1 min
435

दिल में तेरे प्यार का दफ़्तर खुला

क्या निहायत ख़ूबसूरत दर खुला


वो परिन्दा क़ैद में तड़पा बहुत

जिसके ऊपर था कभी अम्बर खुला


ख़्वाब आँखों से चुरा वो ले गए

राज़े-उल्फ़त तब कहीं हम पर खुला


जी न पाए ज़िन्दगी अपनी तरह

मर गए तो मयकदे का दर खुला


शेर कहने का सलीक़ा पा गए

‘मीर’ का दीवान जब हम पर खुला


वो ‘असद मिर्ज़ा’ मुझे सोने न दे

ख़्वाब में दीवान था अक्सर खुला



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract