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INDU JAIN

Abstract

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INDU JAIN

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पुरुषार्थ

पुरुषार्थ

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अतीत अब परे

साक्षात की बुलंदी से है

वास्ता अब है मेरा

यथार्थ से।


ना शुभ ना लाभ

ना भाग्य ना विधाता

लगन है अब

मुझे पुरुषार्थ से।


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