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Mohit Taur

Abstract

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Mohit Taur

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पुराना गुलाब

पुराना गुलाब

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कमरा है वो ऊपरवाला,

कोना उसमे अंधेरेवाला।

अलमारी है टूटी थोड़ी,

उसमे खत था उसकेवाला।


कभी न आता अब मैं ऊपर,

न जाने क्यों आया कमरे भीतर।

टटोलते हुए पुरानी किताब,

निकल आया सुखा गुलाब , ऊपर।


ज़माने बाद आया उसका ख्याल,

हटाया करते थे माथे से उसके बाल।

मोहल्ला करता था बाते हमारी,

उसकी अदाएं करती थी बवाल।


अब है खुश वो अपने घर,

हम न मिले अरसे से मगर,

यूं कभी याद जब आती उसकी,

घूम आता हूं उसका दर।


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