प्रकृति की गुहार
प्रकृति की गुहार
सुनो ! सुनो ! सुनो !
महसूस करो,
क्या ये प्रकृति कुछ
कहना चाहती है हमसे ?
ये प्रकृति की स्थिरता,
ये पानी की चंचलता,
कुछ कहना कहना चाहती है हमसे
यह मनमोहक चांदनी रात
यह सावन की बरसात
कलयुग में अत्याचार का
बढ़ा हम पे अब इत्ता का प्रयोग
रक्त से भीग गई
देखो देखो फिर मेरी कोख
मानव तूने मानव तूने
अपनी जरूरतों के लिए
मुझको इतना इतना दूषित किया
फिर भी फिर भी मैंने
तुझको सब कुछ दिया
अतः आकर मिल की कसम खा ले तू
मुझको को स्वच्छ बनाने की।
