प्रकृति का संदेश
प्रकृति का संदेश
हे मानव, प्रकृति हूँ मैं,
तेरा जीवन, तेरा घर हूँ मैं।
पेड़-पौधे, पहाड़-नदियाँ,
सब कुछ हूँ मैं, तेरी ज़रूरतें पूरी करने वाली।
मैं तुझे ऑक्सीजन देती हूँ साँस लेने को,
पानी देती हूँ प्यास बुझाने को।
भोजन देती हूँ तुझे भूख मिटाने को,
और छाँव देती हूँ धूप से बचने को।
लेकिन तूने क्या दिया मुझे बदले में?
प्रदूषण, कचरा और ज़हर तेरा एहसान।
मेरे पेड़ काटे, मेरे पहाड़ तोड़े,
मेरी नदियाँ गंदी कीं, मेरा पानी छोड़ा।
अब मैं थक चुकी हूँ, टूट चुकी हूँ,
तेरी लालच और स्वार्थ से हार चुकी हूँ।
अगर तूने मुझे नहीं बचाया, तो खुद को बचा पाएगा कैसे?
क्योंकि प्रकृति ही है तेरा सब कुछ, तेरा अस्तित्व।
इसलिए, हे मानव, जाग जा, समझ जा,
प्रकृति को बचा, अपने आप को बचा।
पेड़ लगा, पानी बचा, कचरा कम कर,
और ज़िम्मेदार बन, एक जागरूक नागरिक बन।
क्योंकि प्रकृति ही है जीवन का आधार ,
उसे बचाना है तेरा कर्तव्य।
उसके बिना तेरा जीवन अधूरा,
उसे बचाकर ही बचेगा तेरा भविष्य।
