प्रेम
प्रेम
कौन कमबख्त कहता है की
प्रेम हमने किया?
उसने तो पितृप्रेम में
खुद को वन मे झोंक दिया ।।१।।
कौन कमबख्त कहता है की
प्रेम हमने किया?
उसने तो मातृ प्रेम में
राज-पाट भी फूँक दिया ।।२।।
कौन कमबख्त कहता है की
प्रेम हमने किया?
उसने अपनी पत्नी से भी
मर्यादा से व्यवहार किया ।।३।।
पत्नी के गुम होने से
तड़प तड़प कर विलाप किया ।
ढूँढते ढूँढते प्रेम को पाने
समुंदर को भी पार किया ।।४।।
इस दुनियाँ मे सच्चे प्रेम का
रामसेतु ही प्रतीक है ।
महासागर जिसके आगे
आज भी नतमस्तक है ।।५।।
पत्नी को छुडवाने हेतु
शत्रु से भी युद्ध किया ।
अग्निपरीक्षा लेकर अपने
प्रेम को ऊँचा स्थान दिया ।। ६।।
राजधर्म के खातिर अपने
प्रेम का बलिदान किया ।
अकेले में न जाने वह
कितने गम के आँसू पिया ।। ७।।
चढ़ती रही बार बार
बलि उस के प्रेम की ।
फिर भी बलि नही चढ़ने दी
एकपत्नी के व्रत की ।। ८ ।।
सीता तो थी पतिव्रता
इसमें कोई सन्देह नहीं ।
पत्नीव्रत बस वही तो था
दुसरा कोई और नहीं ।। ९ ।।
सीता को खोने के बाद
'काम' से नाता तोड दिया ।
संन्यस्त हो कर राजा के
धर्म का पालन किया ।। १० ।।
हमने भी तो प्रेम किया
दिलो जाँ से प्रेम किया ।
परा को पाने के लिए
पूर्वा को बस छोड दिया ।। ११ ।।
पत्नी के कटुवचनों से
बेहरा गूंगा हो गया ।
पत्नी के गुम होने से
हमने तो जल्लोष किया ।। १२ ।।
पत्नी से छुडवाने जान
ना जाने क्या क्या किया ।
पत्नी के सम्मान मे
एक भी न ऐसा काम किया ।। १३ ।।
पत्नी मे बस पतिव्रता
हम सदा ढूँढते रहते है ।
हम कब पत्नीव्रत होंगे
यह कभी नही कहते है ।। १४ ।।
आज हम खुश है क्योंकी
राम को अपना घर मिला ।
पर रामजन्म की इस भूमिपर
जरा भी दिल मे स्थान न मिला ।। १५ ।।
अगर राम को मानते तो
हर दिल मे राम जिंदा होता ।
करोड़ो रामों को ज़िंदा देखकर
रावण कभी पैदा ही न होता ।। १६ ।।
कन्या का सम्मान होता
नारी का वो मान होता ।
यदि सभी के दिल मे ज़िंदा
राम का ही नाम होता ।। १७ ।।
राम नाम सत्य है
ये मृत्यु के पश्चात् क्यूँ?
नीति प्रेम पराक्रम उसका
अपने न जीवन मे क्यूँ? १८ ।।
प्रेम का दुसरा नाम है राम
मर्यादा का नाप है राम ।
हिंद की इस पावन भू पर
हर बंदा बने श्रीराम ।। १९ ।।
