Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

पिता- अतुल्य

पिता- अतुल्य

1 min 238 1 min 238

वो जो हारता है,

मुझे जिताने के लिए।


बदसत्तूर लड़ता है, जमाने से,

मेरी ज़रूरतों के लिए।


कभी रोता है अकेले में,

ग़म छुपाने के लिए।


खाली जेबों को खंगालता है,

घर चलाने के लिए।


चल पड़ता है रोज़,

चंद ख़ुशियाँ कमाने के लिए।


सलाम है "तुझे" मेरे ख़ुदा

मुझे ये दुनिया दिखाने के लिए।



Rate this content
Log in

More hindi poem from Preetish Mandaokar

Similar hindi poem from Inspirational