STORYMIRROR

Nalini Raval

Abstract

4  

Nalini Raval

Abstract

फागुन

फागुन

1 min
410

वो तेरा नाम था

धड़कन बन धड़का जो,

सीसा बन पिघलता रहा रगों में,

सांसें बन जीवित होने का

एहसास रच बस जाता था

जो वो तेरा नाम था।


भोर की अरुणिमा सा,

सांझ की संध्या सा,

रात के रतजगों सा,


सर से पांव तक बिजली सा

कौंध जाता था जो,

वो तेरा नाम था।

भोर की भैरवी सा ,

मंदिर में केदार सा,

अग्नि में दीपक सा,

बरखा में मल्हार सा


रग-रग में बज जाता था जो,

वो तेरा नाम था।

मन में स्वयंवर सा,

होठों पर प्रथम चुंबन सा,

विवाह में यज्ञवेदी सा,


अंत में चिता की लपटों से

आकारित उठ जाता था जो

वोते नाम था

वो तेरा नाम था


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nalini Raval

फागुन

फागुन

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract