ओ कान्हा
ओ कान्हा
मेरा हाथ़ तो जरा छोड़ो कान्हा,बड़ी लाज आती है
प्रीतमयी सरीता भी यहाँ प्रीत का गीत गाती है
धडकनों में बसे हो तुम ये प्रीत बख़ूबी जानती है
मेरी साँसो में भी बाँसूरीं की मधूर धून गुनगुनाती है
कैसे कहूँ कान्हा तुमसे ये कैसे मुझे सताती है?
समर्पण की सारी सीमाएँ मुझमें मैं को मिटाती है
प्रेम और विश्वास की धरोहर हर पल प्रीत के दीप जगाती है
पावन प्रणय की प्रीत को निर्मोही से छूपकर सजाती है
साँझ सिमटके पलकों में सपना बनके छा जाती है
तेरे कदमों की आहट से ये सारी चाँदनी भी महकाती है।

