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Prashansa Chandekar

Abstract

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Prashansa Chandekar

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मुख्तसर ही सही

मुख्तसर ही सही

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परस्तिष में जब झुंकी नज़र,

तब तुम्हारा चेहरा दिखाई दिया आज।

जाने किस मोड़ पर रहोगे तुम।

मुख्तसर ही सही, जाने कब मिलोगे तुम।


बीते हुए पल और बीता हुआ कल,

ना मैं फिर ला पाऊंगा कभी।

क्यों हम हुए जुदा, ये ना मैं समझा

और ना तुंम्हे समझा पाऊंगा कभी।


जिंदगी के उस मुकाम पर थे हम,

जब ना मैं झुक सकता था

ना तुमने झुंकने की कोशिश की।

डटे रहे हम, यही हमारी तबाही थी।


चलो समझो मैंने माफ़ी मांग ली होती,

क्या तुम मुझे माफ़ कर देती?

क्या हमारे दूरियों का पहाड़ टूट जाता ?

जब सोचता हूं, तब खो बैठता हूं मैं आपा।


माना कि हमारे बीच एक दीवार बन गई थी

और हमारे दिल भी पत्थर बन गए थे।

पर क्या हम भूल गए थे उस प्यार को

जो लाया था तुम्हारे करीब मुझको ?


जवानी के प्यार को ना कोई समझ

पाया है, और ना जवानी के इंतिकाम को !

ना बुढ़ापे के ग़म को मैं समझ पा रहा हूं,

और ना इस चाहत को मिटा पा रहा हूं।


सोचता हूं कि अगर तुम बस एक बार,

बस एक बार और मुझे मिलकर मुझसे

वही सवाल एक बार फिर पूछ लो

और मेरा दिल क्या, मेरी जान भी ले लो।


पर मुख्तसर ही सही,

बस एक बार फिर मिल जाओ।


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