STORYMIRROR

RAJSHRI YADAV

Inspirational

4  

RAJSHRI YADAV

Inspirational

मन की अभिलाषा

मन की अभिलाषा

1 min
335

तोड़ कर बंधन जगत के

अब मैं उड़ना चाहती हूँ

स्वयं को समर्पित कर

खुद से जुड़ना चाहती हूँ।


बहुत गुजरी सिर झुकाते 

अपने मन के भाव दबाते

स्वार्थी रिश्तों के मोहजाल से

अब मुक्त होना चाहती हूँ।


ज़िंदगी की भागदौड़ में

जिन सपनो को दफन किया मैंने

आज अपने उन सपनों को

खुला आसमान देना चाहती हूँ ।


पूर्ण समर्पण दिया सभी को

मन को बाँधा फर्ज की जंज़ीरों से

क्यों मिला नही मुझको वो समर्पण

इन सारे प्रश्नों के अब मैं उत्तर चाहती हूँ।


दो पाँव का सफर था मेरा

एक से चलती रही मैं

लड़खड़ाती ज़िन्दगी में

अब संभलना चाहती हूँ।


कहाँ थी धरती मेरी और

कहाँ था मेरा आसमाँ 

इस पाषाणी जगत में 

पवित्र प्रेमानुभूति चाहती हूँ।


तृषित अतृप्त मन की चाह का

अंत कर अब इस मृगतृष्णा का

परमात्मा के परमप्रकाश में

अब विलीन होना चाहती हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational