STORYMIRROR

Tanvvi Agarwal

Abstract Inspirational

4  

Tanvvi Agarwal

Abstract Inspirational

मन का पिंज़रा

मन का पिंज़रा

1 min
64

तुझसे भाग रही थी या तेरी तरफ़?

मेरी ये मन की उलझन,

इसे शांत कर दे,

मुझे मेरी मंज़िल दिखा दे।


उन यादों को भूल ना पाऊँ,

नए ख़्वाब बुन ना पाऊँ,

इधर खाई उधर कुआँ,

किधर जाऊँ किसको पता?


जब हाथ थामे था तो रुक गई,

अब आगे बढ़ना चाहूँ तो बढ़ ना पाऊँ,

इस बंद पिंजरे से कर दे आज़ाद,

दिखा दे ज़िंदगी का खूबसूरत अन्दाज़।


ये किसी शक्स की नहीं,

ये मेरे मन की वो घबराहट की है बात,

उससे ही आज में हूँ,

मुझसे ही आज वो है।


अब और कमज़ोर करने ना दूँ,

इस घबराहट को दूर मैं करूँ,

अपने दिल की आवाज़ को मैं सुनूँ,

अपने राह में निडर होकर चलूँ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract