मानवीय मूल्यों पर दोहे
मानवीय मूल्यों पर दोहे
काम क्रोध मद लोभ की, अति से बचना मित्र।
जो ना माने बात यह, बिगड़े सकल चरित्र।।
ईर्ष्या कभी न कीजिए, बढ़ता इससे बैर।
बैर भाव में कब कहाँ, रही किसी की खैर।।
चोरी करना पाप है, कभी न करना मीत।
खुलती है जब बात ये, घट जाती है प्रीत।।
निंदा चुगली मत करो, बहुत बड़ा यह पाप।
जानें कब ये पलट कर, बन जाए अभिशाप।।
जहाँ जरूरत हो नहीं, मीत रहो चुपचाप।
बिना बात मत बोलना, बढ़ जाता संताप।।
