मांँ
मांँ
शब्दों में वह बात नहीं है
लिख दे तुझे तू बहू माँ
कलम की यह औकात नहीं है
जैसे बिन बोले तूने
मेरी भूख प्यास सब जानी थी
सोर मेरे रोने से लेकर
मेरी खामोशी तक पहचानी थी
समझ यूं ही अबोध मुझे तू
कुछ कहने के हालात नहीं नहीं हैं
लिख दे तुझे हू ब हू मां
कलम की यह औकात नहीं है
काबिल हूं ना चाहता हूं
कि एहसान तेरे चुका दूं मैं
करके बात कोई भी लेने देन की
ममता तेरी झुका दूं में
मां तेरे दुलार के आगे
कुछ भी तो कयानात नहीं है
लिख दे तुझे हु ब हू मां
कलम की यह औकात नहीं है
मां बच्चों सा मैं आज भी
सोते-सोते डर जाता हूं
ना जाने कैसे तू जग जाती है
पास तो तुझे मैं पाता हूं
तेरे साथ से बढ़कर मां
दुनिया में कोई सौगात नहीं है
लिख दे तुझे हु ब हू मां
कलम की यह औकात नहीं है
नाराज कभी तू होकर मुझसे
बातें चुप ना कर देना
मौन तेरा चीखेगा मुझमें
यूँ प्राण मेरे ना हर लेना
तेरे थप्पड़ भी जैसे थपकी है
मां कोई आघात नहीं है
लिख दे तुझे हु ब हू मां
कलम की यह औकात नहीं है
कहूं क्या तुझसे तुझे मैं
मां तू ही तो अभिव्यक्ति है
स्वयं से नहीं मुझे जितनी
मां तुझ से उतनी अनुरक्ति है
बांध सकूं जो कविता में
हां यह वह जज्बात नहीं है
लिख दे तुझे हू ब हू मां
कलम की यह औकात नहीं है
