मान की नई परिभाषा
मान की नई परिभाषा
कर रहे जो मन मेरा,
तो याद दिलाना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी.....
शब्दों से प्रकट सम्मान,
मन को बहुत ही भाता है,
कृत्यों में जो सम्मान जगाओ,
तो तुम्हारा क्या घट जाता है,
पुरुषों के लिए केवल बात नहीं है,
महिलाओं का भी ध्यान पाना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी........
मान हो, सम्मान हो,
ना ऊँची पदवी, ना किसी बोझ का भान हो,
हों जाऊँ स्वतन्त्र अनदेखे बंधनों से मैं,
नपी - तुली ज़िंदगी का साँचा,
आज तोड़ना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी......
सदियों से देवी रूप में सम्पूर्ण समाज में पूजित हूँ,
फिर भी अपनों के ही बीच, अपनों के ही द्वारा अक्सर,
उम्र के किसी भी दौर में,
कर दी जाती दूषित हूँ,
संस्कृति जो गौरवांवित है सदा जिस सदाचार पर,
उसकी महिमा थोड़ा और समझाना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी........
मर्यादा केवल स्त्री की ना समझी जाए,
पुरुषों में भी सदाचरण हो,
केवल नारी महिमा का,
और ना कोरा भाषण हो,
विचार और कर्मों में,
शुद्धता देखना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी.......
माँ बहनों से अनुरोध करूँ मैं,
संतानों को वह संस्कार मिले,
मानव को जो मानव समझे,
लिंग विशेष में ना बाँट लें,
शारीरिक अन्तर अवश्य समझें,
(प्रकृति और पुरुष का)
पर परस्पर सम्मान हो,
देह आकर्षण को अब एक नया दृष्टिकोण मिले,
हर कन्या देवी की प्रतिमा, हर बच्चा अब राम बने,
दिन विशेष की बात नहीं यह,
एक रीत निभाना चाहूँगी........
महिला दिवस की भावना,
हर घर दिनचर्या का भाग बने,
अबोध से प्रौढ़ा तक,
उसे अभिव्यक्ति का सौभाग्य मिले,
कर्तव्य परायण स्वाभाविक गुण नारी का,
उचित शिक्षा व दीक्षा की अधिकारी हो,
निःसंदेह स्वयं की गरिमा को मैं (प्रत्येक नारी ),
ख़ुद भी बनाना चाहूँगी,
दिन विशेष की बात ना हो यह,
एक रीत बनाना चाहूँगी......
