लिख दो
लिख दो
उसका कहना याद मुझे आता है
लिख दो चार पंक्तियाँ खूब रुलाता है
छूट गया पीछे जो यार मेरा
रह-रह कर याद मुझे आता है।
बरबस गुस्से को आ जाना मेरे मन पर
उसकी जिद मुझसे कविता लिखने पर
उन बातों का पहरा,गुस्से का कोहरा सिर पर
रह-रह कर याद मुझे आता है।
यदि काबू होता मुझमें
यदि उत्तेजित न मै होता उसमें
वह यार मेरा अब भी होता
फिर याद उसे कर न मै रोता।
सोच-समझ कर कदम उठाना
सीख लिया है तबसे जाना
छूट गया इक गुस्से में जो
यार मेरा रह रहकर याद मुझे आता है।
