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shubham dwivedi

Abstract

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shubham dwivedi

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लिख दो

लिख दो

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उसका कहना याद मुझे आता है

लिख दो चार पंक्तियाँ खूब रुलाता है

छूट गया पीछे जो यार मेरा

रह-रह कर याद मुझे आता है।


बरबस गुस्से को आ जाना मेरे मन पर

उसकी जिद मुझसे कविता लिखने पर

उन बातों का पहरा,गुस्से का कोहरा सिर पर

रह-रह कर याद मुझे आता है।


यदि काबू होता मुझमें

यदि उत्तेजित न मै होता उसमें

वह यार मेरा अब भी होता

फिर याद उसे कर न मै रोता।


सोच-समझ कर कदम उठाना

सीख लिया है तबसे जाना

छूट गया इक गुस्से में जो 

यार मेरा रह रहकर याद मुझे आता है।


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