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Sujatha Santhanam

Abstract

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Sujatha Santhanam

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ख्वाहिश ही है मेरे पंख

ख्वाहिश ही है मेरे पंख

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ख्वाहिश ही तो पंख हैं मेरे

जो उड़ने की तमन्ना रखते हैं


कड़ी धूप हो या तूफान,

ये पसारते नहीं थकते हैं


तस से मस न हो पाए,

इनके बुलंद हौसले हैं


ख्वाहिश ही तो पंख हैं मेरे

जो उड़ने की तमन्ना रखते हैं।


मंज़िल चाहे दूर क्यों न हो

ये मुड़कर नहीं देखते हैं


कोई साथी हो या ना हो

ये फिर भी बढ़ते रहते हैं


ख्वाहिश ही तो पंख हैं मेरे

जो उड़ने की तमन्ना रखते हैं।


इक मोड़ जब ऐसा सामने आये

हारने का डर मँडराए


फिर भी जीत का नारा लेकर

दिल पे मेरे घर करते है


ख्वाहिश ही तो पंख हैं मेरे

जो उड़ने की तमन्ना रखते हैं।


इक ऐसा भी दिन आएगा

जब मंज़िल होगी मेरे करीब


ख्वाहिशों के कुछ पन्ने

मेरे भी होंगे नसीब


आसमान को छूकर ये

इतिहास बदलकर रखते हैं


ख्वाहिश ही तो पंख हैं मेरे

जो उड़ने की तमन्ना रखते हैं।


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