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Sujatha Santhanam

Others

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Sujatha Santhanam

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हाँ, लिखती हूँ मैं

हाँ, लिखती हूँ मैं

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हाँ, लिखती हूँ मैं

न किताब है छपी कोई

न पन्ने यादों के लिखे

कहानी नहीं लिखती हूँ मैं 

कवि नहीं हूँ

मगर जब कोई पूछे क्या 

करती हो,

तो कह देती हूँ कि 

लिखती हूँ मैं

 

न बचपन की यादें, 

न जवानी की बातें

न पुरानी डगर, 

न नयी सी कोई लहर 

इन सब की गहराईयाँ  

समझ के लिखती हूँ मैं

हाँ! लिखती हूँ मैं

 

न जीवन की कशमकश, 

न हालात पर लिखती हूँ

न रोज़मर्रा की जद्दोजहद 

पे लिखती हूँ

न गाने के लिए लफ्ज़ों में

बहाने लिखती हूँ मैं

न दोस्ती पर, न प्यार के 

किस्से लिखती हूँ

घर चल जाता है, 

ज़रुरत पूरी होती है

मन लगा रहता है, 

इसीलिए लिखती हूँ मैं

 

विज्ञापन लिखती हूँ

निबंध, लेख, अनुच्छेद लिखती हूँ

छपते हैं जो, हज़ार बार लिखती हूँ 

अपने लिए तो नहीं

कई औरों के लिए लिखती हूँ

न जाने कौन पढ़ता है

ये जाने बिना लिख देती हूँ मैं

 

नए ज़माने की नयी 

आशाएं लिखती हूँ

एक पेशे से बंधी हूँ

तभी बेझिझक वही 

लिखती हूँ

 

लोग भी पूछते हैं

दिल में भी सवाल उठते हैं

खुद का कुछ लिखोगी कभी?

खोजती हूँ तब में वह कहानी 

जो हो मेरी ज़ुबानी

इंतज़ार उस दिन का 

करती हूँ मैं

जब दिल से निकलेगी 

एक आवाज़

हाथ खुद बा खुद 

लिख डालेंगे वो शब्द

जो गूंजेंगे बन के गीत या 

शेर, या कहानी

शायद तब समझेंगे लोग

और मानेंगे, जब मैं कहूँगी

जी हाँ लिखती हूँ मैं!

 


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