STORYMIRROR

Mamta Agrawal

Abstract

4  

Mamta Agrawal

Abstract

कहानी सुनाता रहा

कहानी सुनाता रहा

1 min
394

रदीफ़ : रहा

काफिया : आता

मापनी : 212 212 212 212


जिंदगी की कहानी सुनाता रहा

दर्द दिल के सभी मैं छिपाता रहा


प्यार था के नहीं ये पता ही नहीं

बात क्या थी जिगर में दबाता रहा


जज़्ब होते रहे अश्क भीगे अधर

मुसकुरा कर निगाहें चुराता रहा


तोड़कर वो चली पारसा दिल मेरा

आईना कांच में मैं बनाता रहा


इस बिदाई का अब सिलसिला कुछ न हो

अजनबी ज़िन्दगी भर रुलाता रहा


मुफलिसी में नहीं जो हुये हमसफर

हर कमाई उन्हीं पर लुटाता रहा


जीतकर जो मुझे हारता ही रहा 

हारकर भी उसे मैं जिताता रहा


तू बताना “निधी” मैं गलत तो नहीं

मर्म मेरा मुझे क्यों सताता रहा। 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract