कुछ कहा तो नहीं
कुछ कहा तो नहीं
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नज़र उनकी झुकी कुछ हुआ तो नहीं
लब बस हिले ही थे कुछ कहा तो नहीं
वफ़ा की राह चल पड़ा था मन मेरा
जफा ही मिली फिर भी टूटा तो नहीं
ख्वाबों में आ जाते कुछ पल साथ मेरे
उनसे मेरा ख़याल कोई जुदा तो नहीं
शब्द काफिया शेर बन रहे थे ख्याल में
ग़ज़ल मन में बनी कुछ लिखा तो नहीं
उनकी नाराजगी का सबब नहीं समझा
अश्क आया पर आँख से बहा तो नहीं
सूखे फूल ही डाल देते मजार पर “निधि”
मेरी मौत पर न आयें ये सिला तो नहीं।
