STORYMIRROR

Swati .

Abstract Others

4  

Swati .

Abstract Others

केश

केश

1 min
411

ज़माना बीत गया कबसे बंधे हैं

शीशे की गुड़िया से संभल के सजे हैं

गुथों में रस्सी से लगते हैं कभी 

इन गिरहों के भार से कुछ नीचे लदे हैं।


खूबसूरती के बर्तन में सच्चाई टिकती नहीं

हवा लगी नहीं कि उड़ने लगे, उमंगें इनकी रुकती नहीं

यूँ तो तसल्ली को कुछ लटें निकाल रखी हैं 

पर उसूल है, आज़ादी किश्तों में बिकती नहीं।


जो खुल जाएँ कभी, तो गुस्से में आकर

बाँध देते हैं डोरी तेज़ गाँठ लगाकर

गिर जाते हैं टूटकर पाताल में कुछ तो

कुछ सहलाते हैं गाल व्यवस्था का घूँट लगाकर ।


डोरी की पकड़ छूट रही है?

या ये ज़ुबान है इनकी, जो अनंत से अमूक रही है ? 

यूँ तो इत्तफ़ाकों की कमी नहीं

पर इसे समझने में बुद्धि भी चूक रही है।


आज बात परछाइयों के हाथ में नहीं

जो फुसफुसाती थीं ज़हर, शब्द उनके पास में नहीं,

अवाक् हैं सब अंधेरे की रूहानियत देखकर 

जाना है, भरे उजाले ने जितना गुमराह किया, उतना कपट रात में नहीं।


सरककर यूँ टुकड़े पाताल में घुल गए हैं

गिरहें खुली हैं, साँस भरते सिलवट संग मिल गए हैं,

नज़ाकत के पुजारी इसे बगावत कहते हैं,

पर मुझे खुशी है, कि केश खुल गए हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Swati .

केश

केश

1 min पढ़ें

ज़ख्म

ज़ख्म

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract