कैदी चिड़िया
कैदी चिड़िया
सोने के पिंजरे में, कैद हुई एक नन्ही चिड़िया
नाम था उसका भानुप्रिया।
ढूंढ रही थी उसको सखिया।।
सखियों का था नभ भर में संचार
चिड़िया का था, अब एक फुट का संसार
हर क्षण था, स्वतंत्र होने का विचार।।
पतझड़ बीता, आई हरियाली
चक्षु से नदियां बह गई सारी
ना निराश हुई, ना हार ही मानी।।
ध्यान मग्न बैठी बीच दोपहरी
विपदा दूर करो प्रभु मेरी सारी
स्वप्न में आया कृष्ण -मुरारी।।
ना रो! बोला गिरिधारी
दूर होगी द्विधा सारी
कुछ पल प्रतीक्षा कर प्यारी।।
लीलाधर ने, लीला रचाई
चारौ तरफ़ से आंधी आई
यह देख चिड़िया घबराई।।
उसी समय शिकारी आया
पिजरे की ओर हाथ बढ़या
बिजली कड़की, वह घबराया।।
घबराहट मे, पिंजरे का दरवाज़ा टूटा
सहमी चिड़िया का बंधन टूटा
स्वतंत्र हुई, परतंत्रता का दामन छूटा।।
