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Gunjot Kaur

Abstract Tragedy Inspirational

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Gunjot Kaur

Abstract Tragedy Inspirational

इंसान ई आम

इंसान ई आम

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कल मैंने देखा मूसलाधार बारिश की बूंदों को पड़ रहीं थी बॉर्डर के इस पार और उस पार,

दोनों ही तरफ के वर्दी वाले हाथ में चाय की प्याली पकड़ नाच रहे थे धुआंधार,

ना इस तरफ से कोई हथियार तान के खड़ा था ना उस तरफ से बम गिरे,

कायनात की उस खूबसूरत शाम में ना कोई दुश्मन था ना नफरत के तीर फिरे,

ना कोई कौम या मजहब के नारे लगे एक ही आसमान के नीचे बिना किसी जात के पानी में सारे बस भीगने लगे,

बताओ जवानों की क्या दुश्मनी है ना कोई अनबनी है,

चाय भी इकट्ठे पीते हैं, हाथ भी रोज़ मिलाते हैं, फिर भी बंदूकें शरीर पे तानी है,

जंग जब होती है तो मजबूत होने के साथ साथ इनकी आँखों में भी आम लोगों जैसे ही नमी है,

अरे भाई बंदूकें उठाने की वजह तो कार्यालयों में बैठने वाले कुछ लोगों के विचारों की सनसनी है,

जात का मुद्दा भी कोई उठाये और धर्म का गुस्सा भी कोई दिखाए ,

पर बन्दूक उठाने के लिए सिपाही ही हिम्मत उठाये,

हम बस घर में टीवी देखेंगे और जगत का हाल पड़ेंगे,

वह जो वर्दी में खड़े है उनका काम है लड़ना तो वह बस लड़ेंगे,

मजहब, कौम, मुल्क इनके झगड़े हैं सिर्फ जगत तमाशा,

विचारों के इस मैल में क्या रखे कोई आशा,

एक ही ग्रह के सब प्राणी हैं विचारों की अलग परिभाषा है,

खुदा ने धरती पे रखा है तुम्हे इंसान के रूप में तराशा है,

 तुम धरती को ही बाँट दो,

यह कैसी मनमानी है,

 मुल्क बना दो जात बना दो धर्म बना दो खुद को समझा राजा रानी है,

एक ही ग्रह पे एक ही तरह के लोगों को एक ही खुदा ने बनाया है,

दो चार पांच तुमने किये है उसने एक ही इंसानियत का मज़हब बनाया है।


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