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Dinesh Bugalia

Abstract

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Dinesh Bugalia

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इक हसीन एहसास !

इक हसीन एहसास !

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किसी हसींन ने मुझमे कुछ ख़ास देखा है

अपनों सा इकरार मुझमे कई बार देखा है

देखा है उसने अपनी खूबसूरत आँखों से

उसी का हमनवाब अपने आप देखा है


किसी हसीन ने मुझमे कुछ ख़ास देखा है

एक बात में बदलती अँधेरी रात को देखा है

घनी धूप में ठंडी बरसात को देखा है

आँखों से नग्मे चुराते देखा है

लोगों से कुछ छुपाते देखा है


किसी हसीन ने मुझमे कुछ ख़ास देखा है

लोगों को बुराई देते देखा है

अपनों को अच्छाई देते देखा है

देखा है सारा जहां पर तुझसा ना है कोई 

ऐसा उसे हर एक बात पे कहता देखा है

किसी हसीन ने मुझमे कुछ ख़ास देखा है !


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