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Sana Hashmi

Inspirational

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Sana Hashmi

Inspirational

ग़ज़ल

ग़ज़ल

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ये दुनिया ग़र बने दुश्मन, तो मैं परवा नहीं करती..!

हर इक मौज़ू पे लफ़्ज़ अपने, कभी ज़ाया नहीं करती..!


सभी बहती हुई गंगा में, अपने हाथ धोते है,,

ज़माना कर रहा है जो, मैं काम ऐसा नहीं करती..! 


निकल जाता है जब फिर साँप, तो पीटे लकीरें सब,,

बना फ़र्ज़ी मुहिम का मैं, कोई हिस्सा नहीं करती..!


यहां अक़्सर सभी छुप कर, तसल्ली देते रहते हैं,,

न खुल कर साथ दे पाऊँ, तो फ़िर दावा नहीं करती..!


सबब है बस यही तो, सरबुलंदी का मिरे यारों,,

सिवा रब के किसी के, सामने सजदा नहीं करती..! 


यक़ीनन मौत बरहक़ है, तो फ़िर मरने से क्या डरना,, 

सना बेख़ौफ़ सच कहने से, घबराया नहीं करती..!!


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