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Ankit Maheshwari

Abstract

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Ankit Maheshwari

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फ़लसफ़ा

फ़लसफ़ा

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वो जो हमारी कहानी का फलसफा हमारे शेरों से लगते हैं,

चलो आज फलसफा क्या है, उनको समझाते हैं...


बता दो उन्हें की,

हमने पतझड़ में बैठकर बरसात लिखी है..

जो होठों तक नही आई वो बात लिखी है...


चाँद को देख 

सूरज का चमकना लिखा है..

जो किताबों में दबकर सूख गए,

उन फूलों का महकना लिखा है...


चेहरे पर झलकती खुशी में

आंखों की रुआई लिखी है..

भीड़ में भटकती जो बिखर गई 

वो मायूस तन्हाई लिखी है...


रातों में जगमगाते सवेरे लिखे हैं..

गर्दिश में झिलमिलाते अंधेरे लिखे हैं...


मोहब्बत में वफाई लिखी है..

सियासत में सफाई लिखी है...

इश्क़ को काम लिखा है..

रहीम को राम लिखा है...


अंधों के ख्वाब लिखे हैं..

गलियों के नवाब लिखे हैं...

नवरात्रि में रमज़ान लिखा है..

गैरों को भी हमने भाईजान लिखा है...


हमने लिखा है सपनो को मारकर, लाल रंग को सिंदूर,

हमने बलात्कारियों को इंसान लिखा है...

और विकास के नाम पर चिल्लाते हैं वो शहीद -शहीद,

हमने उनके भाषणों में भारत महान लिखा है...


ज़मीन मुकम्मल नही दो गज़ भी इस शहर में मुझे,

तारों से भरा आसमान लिखा है...

और पैदा होते ही ठप्पा लगाया था कि जलाएंगे मुझे,

कल गुरुद्वारे की सीढ़ियों पर बैठ, मैने कब्रिस्तान लिखा है...


कल्पना लिखते-लिखते, सच लिखना भी भूले नही हैं हम..

मगर उस सच से हमारी ज़िंदगी का अंदाज़ा लगा लो,

इतने भी भोले नहीं हैं हम...


हमारी आंखों से देखोगे तो दुनिया खूबसूरत दिखेगी..

समाज के हर अच्छे बुरे की जीती-जागती मूरत दिखेगी...


जो शब्दों से खेलते हैं,

लिखने का हुनर जानते हैं...

और अगर तुम्हें लगता है कि हमे पढ़कर हमारा सच जान लोगे,

तो यकीन मानो, दुनिया तुमसे थोड़ी ज्यादा पहचानते हैं!




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