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devanshu tripathi

Abstract

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devanshu tripathi

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दिल्लगी

दिल्लगी

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खोने से डर रहे हो उसे,

जो तुम्हारा कभी था ही नहीं।


बस आसरा ही तो दिया था उसने,

तुम्हारा सहारा तो वो कभी था ही नहीं।

बेवजह ही दिल्लगी कर ली तुमने।


जिसे साहिल समझने की भूल की,

समंदर था वो, दरिया का

किनारा तो कभी था ही नहीं।


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