दिल की बात
दिल की बात
मैंने कहा मुझे प्रेम हुआ,
समझा सबने गलत दास्तान ए बयां,
जमाने में कोई इसके काबिल ना था,
आजमाइश से लेकिन मुझे मतलब ना था।
प्रेम के लिए ना थी प्रेमी की जरूरत,
बस खुशियों से मैंने थी प्रीत लगाई,
जीना है वर्तमान में खुश होकर,
मतलब की दुनिया से ना थी मुझको मोहब्बत।
जमाने से वफा के बदले मिली बेवफाई,
किसी को भी मासूमियत मेरी ना समझ आई,
"प्रीति" ने प्रीत से प्रीत प्रीति से लगाई,
छोटी-छोटी खुशियों से बड़ी खुशियां बनाईं।
अपेक्षा उपेक्षा कि अब परवाह नहीं,
स्नेह की लता अकबर ने चढ़ने लगी,
अर्थ गूढ़ मोहब्बत का समझ आ गया,
ढाई अक्षर "प्रेम" का मैंने था पढ़ लिया।
प्रेम है भाव बस अपनाने का,
भाव खुशियों का खुद को बस मनवाने का,
प्रेम से प्रेम की राह में प्रेम से चलो,
प्रेम मिलता रहेगा सारे जमाने का।
