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Devesh Yadav

Abstract

4.7  

Devesh Yadav

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बस यही एक संगीन जुल्म मैं बार बार करता था

बस यही एक संगीन जुल्म मैं बार बार करता था

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बस यही एक संगीन जुल्म मैं बार बार करता था।

भँवर के बीच से दरिया को पार करता था।।


लोगों ने छीन लिया पुष्प से सुगन्ध को,

वरना पेड़ भी फूल से प्यार करता था।


वो कहता है कि वक्त ने मुझे पत्थर बना दिया,

जो रोज वक्त को भी संगसार करता था।


मैं कितना अजीब शक्श था, खुद ही अलविदा कहा लेकिन।

फिर भी हर शाम मैं उसका इंतजार करता था।।


बस यही एक संगीन जुल्म मैं बार बार करता था।

भँवर के बीच से दरिया को पार करता था।


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