भारत के अंगारे
भारत के अंगारे
वो जवान थे, वो इंसान थे,
वो ईमान थे, वो देश की जान थे।
18 साल की उम्र में गन उठाने वाले,
वो तो भारतीय सेना ही थे।
सुबह मैदान में दौड़ने वाले थे वो,
सारी कंफर्ट्स मिटाने वाले थे वो,
अपने शरीर के हर एक अंग को थकाने वाले थे वो,
देस के लिए मरने और मारने वाले थे वो।
ना अपने परिवार की थी फिक्र ,
ना दोस्तों के साथ मस्ती करनी की जिक्र,
ना पैसे कमाने की थी आशा,
और ना ही पैसे उड़ाने की थी कोई अभिलाषा।
ना पानी का खौफ और ना ही हवा का,
शरीर में चिंगारियाँ लेकर चलते थे,
वो तो अग्नि कुल के अंगारे थे।
कभी सियाचीन में , तो कभी रेगिस्तान में,
गूंजती थी उन्हीं की आवाजें,
वो तो थे मुसाफिर ,
बस दहाड़ना जानते थे।
थे एक सौ के बराबर,
अपने घर लौट ते थे सबको हराकर,
कभी दो पैरों पर,
तो कभी चार कंधों पर।
मां को सताता था एक ही ख्याल,
"क्या जिंदा होगा मेरा लाल?"
यह सोचकर रोती थी वो हर साल।
शहीद की पत्नी कहती थी एक ही बात,
"मांग सुनी करके आ गए वो देश के काम",
बच्चे गर्व से कहते थे ,
"था वो मेरा बाप, जिसने धो दिया दुश्मनों के पाप,
और लिखवा लिया शहीदों के लिस्ट में अपना नाम।"
कोई भी नहीं जान पाया,
था असल में वह कौन पराया,
भारत मां की मिट्टी में जन्मा था वो एक वीर,
जिसकी ना थी कोई हीर, और ना ही खुद का शरीर।
वो तो था पागल,
माथे में कफन और हाथों में पतंग लेकर चला करता था,
वो वीर जवान हँसते हँसते कर देता था ,
अपनी जिंदगी भारत मां के लिए कुर्बान।
