अहम् ब्रह्मास्मि
अहम् ब्रह्मास्मि
मैं शत्रु, रक्त पीपाशु का
क्षमता हूँ, धर्म के आँसू का
मैं कर्म भी हूँ, परिणाम भी हूँ
मैं तीव्र गति, विराम भी हूँ
मैं श्रम भी हूँ, विश्राम भी हूँ
सुबह भी मैं, और शाम भी है
मैं अधोगति, अधर्म का हूँ
संग धर्म का, उत्थान भी हूँ
कुरुक्षेत्र के रण का, न्याय हूँ मैं
सत्कर्म का, निर्माण भी हूँ
नरसिंह हूँ मैं, गोविंद भी हूँ
त्रेतायुग का, श्रीराम भी हूँ
मैं ऊष्मा भी, शीतलता भी
अज्ञात सा एक तूफान भी हूँ
मजबूर हूँ, नियति से बेशक
पर वक़्त का मैं, सम्मान भी हूँ
मैं शांत भी हूँ, परेशान भी मैं
मानवता का कल्याण भी हूँ
मैं जीव स्वयं, मैं ब्रह्म भी हूँ
मैं ही सकल, ब्रह्माण्ड भी हूँ
मैं शास्त्र ज्ञाता, सर्वश्रेष्ठ
शास्त्र ज्ञानी मैं, प्रकांड भी हूँ
मैं विष्णु हूँ, परशुराम भी हूँ
दधीचि का, बलिदान भी हूँ
मैं जगत पिता, परमेश्वर हूँ
आदर्शों का, प्रमाण भी हूँ
मैं ही जीव का, जीवन स्वयं
जलती चिता, समसान भी हूँ
मैं युगों युगों की तपस्या हूँ
मैं मनचाहा वरदान भी हूँ
