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Priya Verma

Abstract

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Priya Verma

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संघर्ष बिना है लक्ष्य नहीं

संघर्ष बिना है लक्ष्य नहीं

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तू धूप सुनहरी है तो क्या

मैं नदियों का जल शीतल हूँ

तुम नील गगन भी हो तो क्या

मैं धरती का सुंदर तल हूँ

गर जगत का जीवन एक तू है

तो बहता समय मैं अविरल हूँ

तुम खुशियां भी ग़र हो जग के

मैं जीवन का हर एक पल हूँ

तू तीव्र गति गर आंधी की

तो समझ ले मैं तेरा बल हूँ

बेशक तू कर्म जगत का है

तू देख, मैं कर्मों का फल हूँ

तुम आगे की गर चिंगारी हो

मैं निर्मल और शीतल जल हूँ

संघर्ष हो ग़र तुम आज के

तो तेरे सपनों का मैं कल हूँ

जो चोट दे मैं वो राह नहीं

तो देख मुझे, मैं समतल हूँ

संघर्ष बिना है लक्ष्य नहीं

बिन तेरे मैं तो अवतल हूँ



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