STORYMIRROR

Baljak

Abstract

4  

Baljak

Abstract

आस्तित्व का अस्त

आस्तित्व का अस्त

1 min
572

चंद लमहो के लिये रुकना था

एक सराय पर

लागाव इतना हुआ की बस 

काफिला बना बैठा

अपनो का

सराय को ही खरीदना

चाहा था कब


तुमने साथ क्या छोडा चमकती दमकती 

सभी गलिया रोशनी से

सजी तो थी

मगर विरांन

मानो जैसे कागज के फूलों पर

गुंगूनते भवरो 

की फिजूल कोशिश


सेहत भी तुम राहत भी तुम

 तुम्हीं से

मेरी दुनिया होती आबाद 

मेरे अस्तित्व की तुम थी 

रूह

क्या मुमकीन है 

नामुमकीन हो जाये मुमकीन

तस्वीर से बाहेर

आओ तुम 


मेरे अस्तित्व को अस्त होने से

बचाओ

सच तो यह है

चंद लमहो के लिये रुकना था

एक सराय पर.


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract