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Rashmi Srivastava

Abstract

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Rashmi Srivastava

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आपदा

आपदा

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भयभीत हो रहा है मानव कोरोना जैसी महामारी से

जीवन है ठहर गया एक जानलेवा बीमारी से ।। 

थम गया ठहर गया सा सब लगता है, 

जीवन होगा कभी पहले जैसा यह एक सपना सा लगता है ।। 

मानव है कैद घर की चारदीवारी में ,

परींदे स्वच्छंद हो विचरण कर रहे हैं सभी दिशाओं में ।। 

प्रकृति ने भी अपना रूप है बदल लिया, 

खुला आसमान चहचहाती हुई गौरैया कबूतरों की गुटर्गू से

पर्यावरण सभी कुछ तो है बदल गया ।।

धनवान और निर्धन में कोई फर्क नहीं है रह गया, 

आदमी एक निरीह प्राणी सा बेबस हो कर रह गया ।। 

चारों दिशाओं में मचा हुआ है कोहराम , 

सभी एक दूसरे को कर रहे हैं बदनाम ।। 

आदमी आदमी को छूने से है घबरा रहा, 

कैसे होगा इस आपदा से छुटकारा कोई नही है समझ पा रहा।। 

धार्मिक,सामाजिक ,राजनीतिक कार्य हो गये हैं सब परे,

सब हैं इस वायरस से डरे हुए।। 

हे प्राणी ये समझ ले जान है तो है जहान,

प्रकृति कर रही है सावधान।

प्रकृति कर रही है सावधान ।।


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