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Gayatri Sharma gunjan

Classics

3  

Gayatri Sharma gunjan

Classics

प्रेम की बाध्यता

प्रेम की बाध्यता

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नैन्सी आज बहुत विचलित सी लग रही थी। बहुत दिनों के बाद उसने हेमंत को फोन लगा ही लिया। उसे उम्मीद थी कि इतने दिनों बाद हेमंत उसकी आवाज सुनकर ख़ुशी से झूम उठेगा। किन्तु उसके मन की बात वही जाने। 

'हैलो '! हेमन्त ने बोला ! 'नैन्सी' "कैसे हो हेमन्त "? मैं बिलकुल ठीक हूँ? किसी काम से फ़ोन किया है तो बताओ।

हेमंत की यह बात सुनकर नैन्सी के दिल पर जैसे सांप लोटने लगा हो। हेमंत का ऐसा बदला व्यवहार वो समझ नहीं पाई कि इतनी जल्दी उसका प्यार कितना बदल सकता है। मन ही मन सोचने लगी।

'हेमंत' "कहाँ खो गई ,कहो ! क्या बात है"? अब नैन्सी क्या कहती। उसने कहा; कहीं तो नहीं बस कुछ याद आ गया था। हेमंत ने उसे कहा देखो नैन्सी ऐसे बार-बार फ़ोन मत किया करो। मैं कब ,कहाँ, किस कंडीशन में हूँ तुम्हे तो नहीं मालूम ना। नैन्सी स्तब्ध सिर्फ सुनती गयी। अब कुछ कहने सुनने को कुछ नहीं बचा था। किसी कारणवश हेमंत को भी बेरुखे से पेश आना पड़ा कि नैन्सी उसे भूलकर जीवन में आगे बढ़ सके। और नैन्सी ने यह समझा कि दोस्ती से ज्यादा हमारे रिश्ते में कुछ नहीं बचा।

कहते हैं प्यार स्वतंत्र भावना होता है हमें उस व्यक्ति को स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए क्योंकि प्यार सच्चा होगा और वो आपसे प्यार होगा तो आपके पास वह शख्स जरूर वापस आएगा। नैन्सी हेमंत से बेइंतहां प्यार करती थी और हेमंत भी। लेकिन हेमन्त ने नैन्सी से दूरी बना लिया क्योंकि वो जानता था इस रास्ते पर आगे उन दोनों का कोई मुकाम नहीं था। और नैन्सी ने यह मान लिया कि दोस्ती से ज्यादा उनके बीच कुछ भी नहीं है।


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