मनोरंजन और बदलता परिवेश
मनोरंजन और बदलता परिवेश
मनोरंजन के बिना जीवन संभव नहीं। अंग्रेजी की कहावत है, " ऑल वर्क एंड नो पर्दे, मेक्स जैक ए डल बाॅय" यह सत्य ही है। हम इंसान हैं, मशीन नहीं। इसलिए मनोरंजन जीवन में अत्यन्त आवश्यक है।
आज के बदलते परिवेश में सोच काफी बदल रही है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उत्तरोत्तर तरक्की हुई है। पुराने समय में हरेक कार्य मानव जनित था परन्तु आज इंसान तकनीकी के आगे गुलाम बन गया है। कार्य बेशक तेज़ी से होता है परन्तु उतनी ही तेज़ी से व्यवधान उत्पन्न होने पर व्यक्ति असहाय महसूस करता है। जबकि पहले मानव जब हाथों से काम करता था, तब कार्य करने का मज़ा ही कुछ और था। मनुष्य सुदृढ़ था, सेहतमंद था, ज्यादा खुश था, वक्त ज्यादा था और जीवन जीने के लिए समय था, भले ही धन कुछ कम हो।
आज इंसान के जीवन में भागमभाग मची हुई है। धन, धन और धन के पीछे मानव भाग रहा है, जीवन मूल्यों का अभाव होता जा रहा है। धन का ठीक तरह से न उपयोग कर पा रहा है, न ही मजा उठा पा रहा है।
ऐसे जीवन का करता उपयोग, जहाँ मनोरंजन न हो? सोचिए, विचारिये और समझिए - जीवन हमारा है, मनोरंजन के बिना अधूरा है।
