Ratna Kaul Bhardwaj

Drama


5.0  

Ratna Kaul Bhardwaj

Drama


पहचान बदलती गई

पहचान बदलती गई

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मैं एक सम्पन्न परिवार में जन्मी थी। मैं उस पीढ़ी की पहली संतान थी। मैं बेटी थी। बहुत लाड मिला, गोदियों में झुलाया गया, लक्ष्मी का रूप माना गया। क्या दिन थे, माँ बाप के चेहरे खिले रहते थे। पहली संतान का सुख सारे परिवार के लिए बहुत ही सुखदाई था।


साल बीतते गए। कब में पांच साल की हुई , पता ही नहीं चला। पूरा दिन मैं चहकती - फुदकती रहती,  इतना प्यार दुलार मिला कि मैं ज़िद्दी बनती गई, फिर भी घर वालों के प्यार - दुलार में कोई कमी नज़र नहीं आई। हर सदस्य की मैं जान थी।


आज अचानक घर में ख़ुशी का माहौल सा था पर साथ में कुछ तनाव भी था। मेरी माँ किसी पीड़ा से परेशान थी। मैं नादान कहाँ जानती थी कि घर में एक छोटा मेहमान आने वाला था। वे कह रहे थे माँ को अस्पताल लेकर जाना पड़ेगा। यह भाषा मेरी समझ से परे थी। मैं तुनक कर बैठ गई, मुझे माँ के पास बैठना था, मुझे माँ की गोद चाहिए थी। मैं माँ की पीड़ा से बिलकुल अनजान थी। सब समझाते रहे पर मैं अपनी ज़िद्द कहाँ छोड़ने वाली थी। अक्सर यही तो हुआ करता था, मैं ज़िद्द करती थी और सारा परिवार मेरे आगे - पीछे चलता रहता था।


मुझे किसी तरह से समझा - फुसला कर माँ को अस्पताल ले जाया गया। मैं अपनी दादी की गोद में आधी सोई आधी जागी हुई थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बज उठी। न जाने ऐसा क्या हुआ था सब ख़ुशी से नाच रहे थे। मिठाइयां बंटने लगी थी, सब एक दूसरे को गले लगा रहे थे। मैं नादान, मेरी समझ से परे, यह सब देख रही थी। अचानक दादी ने मुझे गोद से उतारा और दूसरे कमरे के पलंग पर पटक दिया मैं ज़ोर ज़ोर से रो रही थी पर यह क्या ! आज मेरे रोने की आवाज़ पर किसी की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं थी। किसी को मेरी आवाज़ ही नहीं सुनाई नहीं दे रही थी। अचानक दादी कमरे में आकर मुझे चूमते हुई बोली, "अरे वाह, आलेले, आज गुड़िया के घर में छोटा भाई आ गया।" प्यार से गले लगाया पर उस प्यार की कशिश कुछ कम पड़ गई थी, कहीं छोटी सी दरार ने अपनी शक्ल दिखाई थी। क्यों आखिर आज ऐसा क्या हुआ था ? क्या आज मेरी पहचान बदल गई थी ? आज मेरी पहचान प्यारी बेटी से, लक्ष्मी से, परी से, एक भाई की बहिन मे तब्दील हो गई थी।


माँ एक दिन के पश्चात घर आ गई। मैं रोते भिलखते माँ के पास पहुँच गई और उनकी गोद मे बैठने की ज़िद्द पर अड़ गई पर माँ थोड़ी सी परेशानी की हालत मे मुझे थोड़ा दूर बैठने को कह रही थी पर मैं कहाँ मानती। ऊपर से वह नन्ही सी जान जिसको देखकर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, आता भी क्यों नहीं , मेरी गोद पर उसने कब्ज़ा जो कर लिया था और माँ उसको सीने से लगा कर दूध पिला रही थी। सब आकर उससे प्यार से पुचकार रहे थे , बड़ी नाज़ुकता से उससे छू रहे थे, मेरी परेशानी और व्याकुलता का अंदाज़ा किसी को भी नहीं था। 


मैं रोती रही, बिलखती रही, बार -बार एक ही रट, " मुझे माँ की गोदी मे बैठना है।" मैं अपनी ज़िद्द पर अड़ी हुई थी। पापा भी वहीँ पर खड़े थे और मुझे प्यार से कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मैं अपनी नासमझी की वजह से कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। यह क्या ! पापा एक दम चिल्लाते हुई बोले, " चुप हो जा नहीं तो एक चांटा मारूंगा।" पर मेरा रोना कहाँ बंद होना था।फिर अचानक, "तड़ाक !"मेरा सर एकदम चकराया था।


पापा का लोहे जैसा हाथ मेरे चेहरे पर अपना पूरा निशान छोड़ गया था। मैं सहमी हुई दूर कोने में जा गिरी थी। मेरी आंखों से आँसूं निकल रहे थे। आज घर की हवा में परिवर्तन आया था। आज मुझे चुप कराने कोई आगे नहीं आया था। न जाने सब कहाँ व्यस्त हो गए थे । माँ भी उस नन्हे से बच्चे को संभालने में लगी थी। आज मेरी आंखों और नाक का पानी एक हो रहा था पर किसी को इसकी परवाह ही नहीं थी। आज दादी की परी को दादी भी नहीं दिख रही थी। दिखती कैसे ! मेहमानों के स्वागत में बहुत ही व्यस्त थी।


रोते- रोते में वहीँ एक कुर्सी पर लुढ़क कर बैठ गई थी। मुझे भूख भी सत्ता रही थी पर आज मेरी भूख के बारे में सब शायद भूल चुके थे। अचानक सब बदला बदला सा लग रहा था। सब अटपटा सा लग रहा था । समझ नहीं आ रहा था कि आज ऐसा क्या हुआ था कि सब इतने व्यस्त हो गए थे औऱ इस कल की लक्ष्मी का ध्यान आज किसी को क्यों नहीं आ रहा था। घर में आई हुई नई ख़ुशी के पीछे आज यह कल की परी बेगानी हो गई थी। क्या मेरी पहचान वाकई में बदल गई थी? क्या समाज के सच्चे - झूठे रिवायतों ने मुझसे मेरी पहचान छीन ली थी? क्या यह हमारे समाज का एक करूप रूप था!


कितने ही सवालात, कुछ मेरी समझ के मुताबिक, कुछ मेरी समझ से परे, मेरे मस्तिष्क में घूम रहे थे। समय निकलता गया और आगे चलकर समाज के तौर  तरीकों ने मुझसे मेरी पहचान करा दी। कल की यह परी हर पड़ाव पर अपनी पहचान बदलती गई। कभी किसी की बेटी, कभी बहिन; कभी पत्नी, कभी बहू; कभी माँ ! कितने ही रिश्तों के तमगे मुझे पहनाये गए पर मेरा असली अस्तित्व अभी भी कहीं गुम था। पर ऐसा कब तक चलता। अब उम्र के कई पड़ाव पार करके मैं समाज और इसकी कुरीतियों को खूब समझ चुकी थी।


या आज शायद मैं नींद से जाग गई थी । मैं आधुनिक भारत की नारी जहाँ संस्कारों की सुन्दर माला गले में पहने खड़ी हूँ। वहीं आज महिला सशक्तिकरण के रूप में अपने अधिकार को भी खूब समझ चुकी हूँ। आज मैं खुले आसमान के नीचे परिंदो की तरह उड़ना जान चुकी हूँ। एक तरफ मर्यादाओं का पालन तो दूसरी तरफ सामाजिक बदलाव, आज, यही मेरी असली पहचान है।


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